दीपावली में माटी के दीपों की धूम – लोकल फॉर वोकल का मंत्र हो रहा चरितार्थ

भारत ही एक ऐसा देश है जिसे भारत माता कहा जाता है। हमारा देश माटी को भी माता की ही तरह पूजता है। देश की सनातन और वैदिक परंपरा में पूजा, हवन, यज्ञ, विवाह आदि सभी मांगलिक कार्यों में मिट्टी के बने बर्तनों और दीपों का उपयोग किया जाता है। आज हर शहर, हर गांव के घर-घर में बिजली पहुंचने के बाद घरों में बिजली के बल्वों से सजावट की जाती है, लेकिन घर में मिट्टी से बने 25 दीपक अवश्य रखे जाते हैं। पूजा घर में देव प्रतिमाओं के समक्ष मिट्टी के दीप में ही घी के दिये जलाए जाते हैं। तुलसी माता के चबूतरे, कुलदेवताओं के कक्ष तथा पेयजल स्त्रोत पर भी पूरे कार्तिक माह मिट्टी से बने दीपक जगमगाते हैं। नवरात्रि पर्व से ही मिट्टी के बर्तनों की बिक्री शुरू हो जाती है। रीवा जिले के शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में अभी भी मिट्टी के कलश और दीपकों की अच्छी बिक्री होती है। आसपास गांवों के मिट्टी के बर्तन बनाने वाले शिल्पी शहरों में डेरा जमाकर महीने भर मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं। इनमें सर्वाधिक बिक्री माटी के दीपों की होती है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के लोकल फॉर वोकल के मंत्र को माटी के बर्तन बनाने वाले चरितार्थ कर रहे हैं। शशि प्रजापति निवासी रीवा 15 दिनों से मिट्टी के बर्तन बेच रही हैं। इसी तरह ग्राम महसांव के गिरधारी प्रजापति भी रीवा में आकर मिट्टी के बर्तन बेच रहे हैं। उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ के रहने वाले विकास प्रजापति कई वर्षों से दीवाली के समय रीवा आकर माटी के दीपक और अन्य बर्तन बेचते हैं। उन्होंने आमजनता से मिट्टी के बर्तनों के उपयोग की अपील की है। रीवा के ही रामनरेश कुमार भी माटी के बर्तन बेचकर पूजा घरों को रोशनी देने के साथ अपने घर में समृद्धि की दीवाली मनाएंगे। समाज में तेजी से शहरीकरण होने के बावजूद अभी भी प्राचीन परंपराओं से लगाव बना हुआ है। हर घर में माटी के दीपक अवश्य जलाये जाते हैं। इन दीपकों से हमारे घरों में उजाला होने के साथ हजारों गरीब परिवारों के घरों में भी सुख और समृद्धि का उजाला होता है।

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