निराश्रित गौवंशों : क्या गौशाला से ऐरा प्रथा पर लग पाएगा नियंत्रण

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खेती तथा पशुपालन बहुत लंबे समय से ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा आजीविका का आधार हैं। परंपरागत रूप से हलबैलों से खेती की जाती थी। समय के साथ खेती करने की तकनीक पद्धति और उपकरणों में परिवर्तन हुए अब खेती के मुख्य काम मशीनों के माध्यम से होने लगे हैं। कृषि यंत्रीकरण तथा ग्रामीण क्षेत्रों से कृषि मजदूरों के बेहतर रोजगार के लिए गांव से बाहर जाने के कारण खेती पूरी तरह से बदल गयी। पहले खेती और पशुपालन एक दूसरे से जुड़े हुए व्यवसाय थे। अब दोनों अलग-अलग व्यवसाय हो गये हैं। खेती में पशुओं की उपयोगिता लगभग समाप्त हो गयी है अब गौवंशीय पशुपालन केवल दूध प्राप्त के लिए किया जाता है जिसके कारण बड़ी संख्या में नरगौवंश अनुपयोगी होकर ऐरा प्रथा को बढ़ावा दे रहे हैं। ऐरा प्रथा पर नियंत्रण के लिए पशुपालकों को समझाइश देने के साथ कई वैधानिक उपाय किये जा रहे हैं। एक ओर गौशालाओं का निर्माण कर निराश्रित और आवारा गौवंश को सुरक्षित रखने का प्रयास किया जा रहा है और दूसरी ओर पशुओं को खुला छोड़ने वाले पशुपालकों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज करने और एक हजार रूपये जुर्माना लगाने की भी कार्यवाही की जा रही है। रीवा जिले में पंचायत पदाधिकारियों ने ऐरा प्रथा पर नियंत्रण के लिए सराहनीय पहल की है। जिला पंचायत के सदस्यों की गौसंरक्षण समिति बनायी गयी है जो जिला और विकासखण्ड स्तर पर ऐरा प्रथा के नियंत्रण के लिए किये जा रहे प्रयासों की समीक्षा कर रही है। यह समिति किसानों को पशुओं को खुला न छोड़ने के लिए लगातार प्रेरित भी कर रही है।

जिला पंचायत के सदस्यों की गौसंरक्षण समिति ऐरा प्रथा के नियंत्रण में कर रही सहयोग
इस संबंध में संयुक्त संचालक पशुपालन डॉ. राजेश मिश्रा ने बताया कि पशुओं को खुला छोड़ने के कारण उत्पन्न ऐरा प्रथा गांव के लिए बड़ी समस्या है। आवारा मवेशी किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। जिले के हाइवे तथा अन्य सड़कों पर पशुओं के विचरण के कारण कई सड़क दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। आवारा पशुओं को गौशालाओं में ले जाने के लिए शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में लगातार प्रयास किये जा रहे हैं। जिले में वर्तमान में 29 गौशालाओं का संचालन किया जा रहा है। इनमें लगभग 3 हजार निराश्रित गौवंश हैं वर्ष 2020-21 में जिले में 200 गौशालाओं के निर्माण का लक्ष्य रखा गया था। इनमें से 45 गौशालाओं का निर्माण पूरा हो गया है जिनका विधिवत संचालन किया जा रहा है। कई गौशालाओं में क्षमता अधिक गौवंश हैं जिले में एक स्थान पर बड़ी संख्या में गौवंश रखने के लिए सिरमौर विकासखण्ड में बसामन मामा गौवंश वन्य विहार की स्थापना की गयी है। इसमें 4 हजार 300 से अधिक गौवंश आश्रय पा रहे हैं। जिले में मऊगंज विकासखण्ड के सीतापुर, गंगेव विकासखण्ड के हिनौती तथा जवा विकासखण्ड के डभौरा एवं घूमन में गौवंश वन्य विहार का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। गौशालाओं में गौवंश की देखभाल के लिए ग्राम पंचायत के गौसेवक को तैनात किया गया है। गौसेवा द्वारा पशुपालन विभाग के सहयोग से पशुओं का टीकाकरण, उपचार एवं पशुओं के कान में टैगिंग का कार्य लगातार किया जा रहा है। संयुक्त संचालक ने पशुपालकों को सभी पालतु पशु बांधकर रखने तथा समुचित देखभाल करने की अपील की है।

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